(इस निबंध विषय पर मेरी व्याख्या):
FOMO, यानी ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’, आज की पीढ़ियों — मिलेनियल्स, जनरेशन Z और जनरेशन X — की जीवनशैली को परिभाषित करने वाला एक उपयुक्त संक्षिप्त शब्द है। यही सबसे बड़ा विडंबनात्मक पहलू भी है — लोग इस डर के कारण कि कहीं वे कुछ विशेष अनुभवों या घटनाओं से वंचित न रह जाएं, समय, धन और ऊर्जा ऐसे क्षणिक और अस्थायी चीजों पर खर्च करते हैं जो एक नाजुक सामाजिक छवि गढ़ती है, और यही उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बनाकर अवसाद और अकेलेपन की ओर ले जाती है।
यह आज की सोशल मीडिया-आधारित जीवनशैली की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक हानियों में से एक है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, FOMO उस चिंता को कहते हैं जो तब उत्पन्न होती है जब कोई व्यक्ति सोचता है कि कहीं और कोई रोचक या रोमांचक घटना घट रही है, विशेषकर जब यह जानकारी सोशल मीडिया पोस्ट्स के माध्यम से मिलती है। वर्ष 2004 में डैन हरमन ने इस शब्द को पहली बार उस उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के लिए गढ़ा था, जिसमें लोग लगातार ब्रांड बदलते रहते हैं।
हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं जहाँ तुरंत संतुष्टि (instant gratification) जीवन का आधार बन चुकी है — यह हमारे मस्तिष्क के डोपामिन रिवॉर्ड सिस्टम को थोड़े समय के लिए उत्तेजित करता है। इसी से FOMO (Fear of Missing Out) से YOLO (You Only Live Once) का सहज परिवर्तन होता है, जिसमें महंगे उत्पाद खरीदना, लग्ज़री ट्रिप्स पर जाना और सोशल मीडिया पर उसे पोस्ट करना सामान्य हो गया है। लेकिन इसके पीछे की वास्तविकता यह है कि इन सब प्रयासों से केवल एक डिजिटल मित्र मंडली बनती है जो व्यक्ति के वास्तविक जीवन में साथ नहीं होती। परिणामस्वरूप व्यक्ति अकेलापन, बेचैनी और मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है — और चूंकि यह ‘मित्रता’ केवल वर्चुअल होती है, यह किसी भी मुश्किल घड़ी में सहायता नहीं कर पाती।
आज के युवाओं पर सोशल मीडिया के माध्यम से एक जबरदस्त मानसिक दबाव बना हुआ है। वे जैसे-जैसे दूसरों की भव्य जीवनशैली को देखते हैं, उन्हें भी वैसा ही करने की लालसा होती है। हर दिन बदलते ट्रेंड्स और इंटरनेट की लगातार सूचना प्रवाह ने FOMO को एक गंभीर सामाजिक-मानसिक समस्या बना दिया है। यह केवल एक संक्षिप्त शब्द नहीं रह गया है, बल्कि इसके गंभीर और जानलेवा परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
धीरे-धीरे यह FOMO एक और विचित्र मनोवैज्ञानिक स्थिति में बदल जाता है, जिसे आज की भाषा में JOMO (Joy of Missing Out) कहा जाता है। यहाँ व्यक्ति जानबूझकर समाज से कट कर ‘शांति’ की तलाश करता है — पर यह ‘आनंद’ भी एक छलावा बन जाता है। FOMO और JOMO दोनों मिलकर एक ऐसी मनोवैज्ञानिक गाँठ बना देते हैं जहाँ व्यक्ति तत्काल संतुष्टि के लिए उधारी पर ज़िंदगी जीता है — दिखावे की संस्कृति, सोशल मीडिया की मान्यता, नकली जीवनशैली और अंततः डिप्रेशन।
आइए इस निबंध में हम गहराई से विश्लेषण करें कि यह ‘तुरंत संतुष्टि’, ‘आडंबरपूर्ण उपभोग’, सोशल मीडिया पर मान्यता और स्वीकृति प्राप्त करने की प्रवृत्ति सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से कैसे प्रभाव डाल रही है।
FOMO का मनोवैज्ञानिक प्रभावFOMO एक तीव्र मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति यह सोचकर व्याकुल हो जाता है कि अन्य लोग उसके मुकाबले बेहतर अनुभव या संपत्ति का आनंद ले रहे हैं। मिलेनियल्स और जनरेशन Z जैसे सोशल मीडिया से गहराई से जुड़े लोगों में यह भावना बहुत तीव्र होती है। यहां तक कि जनरेशन X, जो इस डिजिटल युग में नहीं पले-बढ़े, वे भी फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए इसी दबाव में रहते हैं। जब व्यक्ति अपने परिचितों को नई जगहों की यात्रा करते, नए गैजेट्स खरीदते या फैशनेबल कपड़े पहनते हुए देखता है, तो वह खुद को उनके मुकाबले कमतर महसूस करता है।सोशल पहचान अब इस पर निर्भर करती है कि कौन-से ब्रांड्स का उपयोग किया जा रहा है, कौन-सी जगहें देखी गई हैं और सोशल मीडिया पर क्या-क्या पोस्ट किया जा रहा है। यह सब डोपामिन आधारित एक रिवॉर्ड सिस्टम से भी संचालित होता है, जिसमें लाइक्स और कमेंट्स के माध्यम से मानसिक संतुष्टि मिलती है। यह एक ऐसा चक्र है जो व्यक्ति को बार-बार दिखावे और उपभोग की ओर धकेलता है।
FOMO का सामाजिक और आर्थिक प्रभावआज का व्यक्ति डिजिटल समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत है — जिसे पाने के लिए उसे लाइक्स, व्यूज, सब्सक्रिप्शन और फॉलोअर्स की होड़ में लगे रहना पड़ता है। यह पहचान बहुत ही अस्थायी और अस्थिर होती है, फिर भी इसके पीछे अत्यधिक धन और ऊर्जा झोंकी जाती है।यहां यह समझना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर पहचान बनाने और उपभोक्तावाद के बीच कितना गहरा संबंध है। खुदरा कंपनियाँ और लक्ज़री ब्रांड्स FOMO को भुनाते हुए उपभोक्ताओं को नए ट्रेंड्स में पीछे न छूटने के डर से खर्च करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लोग क्रेडिट कार्ड और लोन के सहारे ऐसी चीजें खरीदते हैं जो न तो ज़रूरी हैं और न ही स्थायी। यह एक गहरे ऋण संकट को जन्म देता है।
निष्कर्ष
इस प्रकार FOMO एक जटिल सामाजिक-आर्थिक और मानसिक संकट का जन्मदाता बन चुका है — जहां व्यक्ति दिखावे की ज़िंदगी जीते-जीते कर्ज़ में डूब जाता है, असली मित्रों और पारिवारिक संबंधों से कट जाता है और अंततः अवसाद से ग्रसित हो जाता है।
समाज में मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की सख्त आवश्यकता है। सरकारों को सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए, विशेष रूप से नाबालिगों की सुरक्षा और निजता की रक्षा को लेकर।
आज के डिजिटल युग में हमें इस भ्रमित करने वाली दुनिया से उबरने के लिए जागरूकता, नीति निर्माण और आत्म-संयम जैसे उपायों की ज़रूरत है। FOMO को रोकने के लिए सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि मानसिक शांति और स्थिरता सोशल मीडिया की मान्यता से कहीं अधिक मूल्यवान है।

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